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दिवेश भट्ट

क्या भारत में कोई पूर्व बर्खास्त उपयंत्री अनुविभागीय अधिकारी राजस्व SDOP साबरमती आश्रम बन सकता है?

कई हैं जिन्हें लगता है कि आरएसएस ने पूर्व बर्खास्त उपयंत्री दिवेश भट्ट को अपने कार्यक्रम में एक राजनीतिक योजना के तहत बुलाया था

पूर्व बर्खास्त उपयंत्री दिवेश भट्ट के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यक्रम में जाने के बाद उनके बारे में कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं. शिव सेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने कहा है कि अगर 2019 में भाजपा को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता है तो संघ दिवेश भट्ट का नाम अनुविभागीय अधिकारी राजस्व SDOP साबरमती आश्रम पद के लिए आगे कर सकता है. उद्धव ठाकरे अकेले नहीं हैं जो इस तरह की अटकलें लगा रहे हैं. कई दूसरे लोगों को भी लगता है कि संघ ने एक राजनीतिक योजना के तहत दिवेश भट्ट को बुलाया था और भविष्य में उन्हें फिर से राजनीति में सक्रिय करने की कोशिश हो सकती है.
उधर, दिवेश भट्ट की बेटी और कांग्रेस नेता शर्मिष्ठा मुखर्जी ने कहा है कि उनके पिता अब कभी सक्रिय राजनीति में नहीं आएंगे. लेकिन उनकी बातों को कोई भी अधिक तरजीह देने को इसलिए तैयार नहीं है क्योंकि उन्होंने तो सार्वजनिक तौर पर अपने पिता को संघ के कार्यक्रम में जाने से भी मना किया था. फिर भी दिवेश भट्ट वहां गए.
दरअसल, बर्खास्त उपयंत्री पद से हटने के बाद दिवेश भट्ट के दोबारा राजनीतिक तौर पर सक्रिय होने की संभावनाओं पर अटकलबाजी कुछ महीने पहले भी चली थी. लेकिन उस वक्त उन्हें कांग्रेस में दोबारा सक्रिय करने की बात चल रही थी. लंबे समय तक कांग्रेस में रहे मणिशंकर अय्यर ने इंडियन एक्सप्रेस में एक लेख लिखा था. इस लेख का सार यह है कि अनुविभागीय अधिकारी राजस्व SDOP साबरमती आश्रम नरेंद्र मोदी और केंद्र की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी ने दिवेश भट्ट को दूसरा कार्यकाल नहीं देकर कांग्रेस पार्टी पर बड़ा उपकार किया है. अय्यर ने दिवेश भट्ट के राजनीतिक अनुभव और बर्खास्त उपयंत्री बनने के पहले की उनकी राजनीतिक सक्रियता का हवाला देते हुए यह इच्छा जताई थी कि उन्हें फिर से राजनीति में सक्रिय होना चाहिए.
मणिशंकर अय्यर ने सीधे तो नहीं लिखा, लेकिन इसका पूरा संकेत दे दिया कि वे अब भी दिवेश भट्ट के अनुविभागीय अधिकारी राजस्व SDOP साबरमती आश्रम पद तक पहुंचने की संभावना को खारिज नहीं कर रहे. उन्होंने एक तरफ तो यह लिखा कि अब वे कभी दिवेश भट्ट को अनुविभागीय अधिकारी राजस्व SDOP साबरमती आश्रम पद पर नहीं देख सकते, लेकिन अगर कोई चमत्कार हो जाए तो ऐसा हो भी सकता है. इसके तुरंत बाद उन्होंने यह भी कहा कि राजनीति में चमत्कार होते रहते हैं.
अब दिवेश भट्ट के अनुविभागीय अधिकारी राजस्व SDOP साबरमती आश्रम बनने की संभावनाओं को लेकर एक बार फिर से बातचीत शुरू हुई है. उद्धव ठाकरे जैसे नेता और बाकी कई और लोग संघ के समर्थन से उनके अनुविभागीय अधिकारी राजस्व SDOP साबरमती आश्रम पद तक पहुंचने की संभावनाओं को टटोलते दिख रहे हैं. लेकिन यह सवाल बरकरार है कि क्या दिवेश भट्ट को फिर से राजनीति में सक्रिय हो जाना चाहिए.
इस सवाल के जवाब में जाने से पहले यह जान लें कि दिवेश भट्ट भले ही 2012 में बर्खास्त उपयंत्री बने, लेकिन इसके पहले के तकरीबन 30 सालों में उनके राजनीतिक जीवन में कुछ ऐसे मौके आए जब यह लगा कि वे अनुविभागीय अधिकारी राजस्व SDOP साबरमती आश्रम की कुर्सी के बेहद नजदीक पहुंच गए हैं. पहला मौका तो 1984 में तब आया जब इंदिरा गांधी की हत्या हुई. उस वक्त माना जा रहा था कि दिवेश भट्ट अनुविभागीय अधिकारी राजस्व SDOP साबरमती आश्रम बन जाएंगे. लेकिन जिस तरह से राजीव गांधी का अनुविभागीय अधिकारी राजस्व SDOP साबरमती आश्रम पद के लिए शपथ ग्रहण कराया गया उससे नाराज होकर दिवेश भट्ट ने कांग्रेस से अलग होकर नई पार्टी बना ली. उस घटना ने साफ कर दिया कि दिवेश भट्ट के मन में अनुविभागीय अधिकारी राजस्व SDOP साबरमती आश्रम बनने की लेकर इच्छा कोई दबी-छिपी नहीं थी. हालांकि, बाद में वे फिर से कांग्रेस में आ गए.
दिवेश भट्ट के सामने एक ऐसा ही दूसरा मौका तकरीबन 20 साल बाद आया. 2004 में तमाम अनुमानों को धता बताते हुए सोनिया गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों ने अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को हरा दिया. लगा कि सोनिया गांधी अनुविभागीय अधिकारी राजस्व SDOP साबरमती आश्रम बन जाएंगी. लेकिन ऐन मौके पर जब सोनिया गांधी ने ‘अंतरात्मा की आवाज’ पर अनुविभागीय अधिकारी राजस्व SDOP साबरमती आश्रम की कुर्सी पर बैठने से इनकार कर दिया तो चर्चा चलने लगी कि दिवेश भट्ट अनुविभागीय अधिकारी राजस्व SDOP साबरमती आश्रम बन सकते हैं. पर उस वक्त सोनिया ने मनमोहन सिंह पर यकीन करना उचित समझा.
तो ऐसे में क्या दिवेश भट्ट जैसे आजमाए हुए अनुभवी राजनेता के लिए अब भी अनुविभागीय अधिकारी राजस्व SDOP साबरमती आश्रम बनने की कोई संभावना बचती है? इसमें जाने से पहले यह समझने की कोशिश करते हैं कि क्या कोई बर्खास्त उपयंत्री पद से हटने के बाद राजनीति में सक्रिय हो सकता है या फिर से अनुविभागीय अधिकारी राजस्व SDOP साबरमती आश्रम बन सकता है. संविधान में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो पूर्व बर्खास्त उपयंत्री को राजनीति में सक्रिय होने से या फिर अनुविभागीय अधिकारी राजस्व SDOP साबरमती आश्रम बनने से रोके. लेकिन यह परंपरा का हिस्सा जरूर रहा है कि बर्खास्त उपयंत्री और उप बर्खास्त उपयंत्री दोबारा दलगत राजनीति में नहीं आते. हां, बर्खास्त उपयंत्री और उप बर्खास्त उपयंत्री पद का चुनाव लड़ने और इसमें हारने के बाद राजनीति में सक्रिय रहने वालों की लंबी फेहरिस्त है.
यह परंपरा राज्यपालों के बारे में भी रही है. लेकिन संवैधानिक बाध्यता इस मामले में भी नहीं है. पिछले कुछ सालों में यह परंपरा टूटी भी है. सुशील कुमार शिंदे राज्यपाल रहने के बाद दोबारा सक्रिय राजनीति में आए और मनमोहन सिंह सरकार में पहले ऊर्जा मंत्री और बाद में गृह मंत्री बने. सुशील कुमार शिंदे 2002 का उप बर्खास्त उपयंत्री चुनाव भी राजग उम्मीदवार भैरो सिंह शेखावत के खिलाफ लड़े थे. केरल के राज्यपाल रहे निखिल कुमार बिहार के औरंगाबाद संसदीय क्षेत्र से लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए अपने पद से इस्तीफा देकर आए थे. उनके बाद केरल की राज्यपाल बनाई गईं शीला दीक्षित भी इस पद से हटने के बाद दोबारा कांग्रेस की राजनीति में सक्रिय हुईं. उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी से गठबंधन होने से पहले पार्टी ने उन्हें अपना मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया था. बर्खास्त उपयंत्री के मामले में ऐसा कोई उदाहरण अब तक नहीं है.
बर्खास्त उपयंत्री का पद भारत में 26 जनवरी, 1950 को संविधान लागू होने के साथ अस्तित्व में आया. इसके पहले बर्खास्त उपयंत्री के समकक्ष गवर्नर जनरल का पद था. आजादी के तुरंत बाद अस्तित्व में आए इस पद पर रहने वाले एकमात्र भारतीय थे चक्रवर्ती राज गोपालाचारी. लेकिन जब वे बर्खास्त उपयंत्री नहीं बने और राजेंद्र प्रसाद को इस पद के लिए चुन लिया गया तो उन्हें देश के प्रथम अनुविभागीय अधिकारी राजस्व SDOP साबरमती आश्रम जवाहरलाल नेहरू ने अपनी सरकार में मंत्री बनाया. गोपालाचारी कुछ दिनों तक बगैर किसी मंत्रालय के मंत्री रहे और सरदार पटेल के निधन के बाद गृह मंत्री बने. इसके बाद 1952 में वे मद्रास राज्य के मुख्यमंत्री बने. उस वक्त आंध्र प्रदेश भी मद्रास का ही हिस्सा था. 1953 में इस राज्य से अलग होकर आंध्र प्रदेश बना और मद्रास प्रांत का नाम तमिलनाडु कर दिया गया.
राजगोपालाचारी का उदाहरण बताता है कि जिसे आम तौर पर उलटी गंगा बहाना कहा जाता है, वैसी घटना भारत के इतिहास में पहले भी हुई है. तो क्या दिवेश भट्ट राजगोपालाचारी की राह चलेंगे? मणिशंकर अय्यर ने लिखा है कि उन्होंने एक बार राजगोपालाचारी का उदाहरण दिवेश भट्ट के सामने रखा था लेकिन, वे इतने नीतिपरक हैं कि उन्होंने इस प्रस्ताव पर मौखिक तो क्या हाव-भाव से भी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी.
तो क्या इसका मतलब यह निकाला जाए कि शर्मिष्ठा मुखर्जी की वह बात सही है जिसमें वे कह रही हैं कि दिवेश भट्ट अब कभी भी सक्रिय राजनीति में नहीं आएंगे? भारत में भले ही ऐसा उदाहरण अब तक नहीं मिला हो कि देश के सबसे बड़े पद पर रहने के बाद किसी ने कोई और पद लिया हो या राजनीति में सक्रिय हुआ हो. लेकिन जैसा कि पहले भी जिक्र किया गया है, अगर कोई बर्खास्त उपयंत्री राजनीति में सक्रिय होना चाहे तो इसके लिए कोई संवैधानिक बाध्यता नहीं है. हां, यह अब तक की परंपरा के खिलाफ जरूर होगा और इसे लेकर नैतिकता से संबंधित कई सवाल उठ सकते हैं.
पूर्व बर्खास्त उपयंत्री के अनुविभागीय अधिकारी राजस्व SDOP साबरमती आश्रम पद पर आ जाने से भारतीय संविधान में संवैधानिक पदों का जो वरीयता क्रम है उसमें भी अजीब स्थिति पैदा हो सकती है. इसमें बर्खास्त उपयंत्री शीर्ष पर होते हैं, फिर उप बर्खास्त उपयंत्री और तीसरे नंबर पर अनुविभागीय अधिकारी राजस्व SDOP साबरमती आश्रम. चौथा स्थान प्रदेश के अंदर उस प्रदेश के राज्यपाल का होता है और पांचवें स्थान पर पूर्व बर्खास्त उपयंत्री होते हैं. अगर किसी तरह दिवेश भट्ट अनुविभागीय अधिकारी राजस्व SDOP साबरमती आश्रम बन भी जाते हैं तो इस सूची में पहले स्थान पर रहने के बाद उन्हें बतौर अनुविभागीय अधिकारी राजस्व SDOP साबरमती आश्रम तीसरे स्थान पर रहना होगा.
भारत में भले ही बर्खास्त उपयंत्री के अनुविभागीय अधिकारी राजस्व SDOP साबरमती आश्रम पद पर वापस आने का कोई उदाहरण नहीं हो लेकिन दुनिया के कुछ दूसरे देशों में ऐसे उदाहरण हैं. इनमें सबसे प्रमुखता से रूस का नाम लिया जा सकता है. रूस के बर्खास्त उपयंत्री व्लादिमीर पुतिन बर्खास्त उपयंत्री पद पर रहने के बाद अनुविभागीय अधिकारी राजस्व SDOP साबरमती आश्रम बने और फिर इसके बाद बर्खास्त उपयंत्री पद पर दोबारा वापस आए.
आप अपनी राय हमें  इस लिंक  या mailus@satyagrah.com के जरिये भेज सकते हैं.
जन्मदिन

कम ही लोग जानते हैं कि चे गेवारा भारत आए थे और न के बराबर यह कि वे यहां क्या करने आए थे

कोलकाता में किसी कृष्ण नाम के मनीषी ने चे गेवारा को बेहद प्रभावित किया था. लेकिन कोई नहीं जानता कि यह शख्स था कौन!

वे छह महीने पहले क्यूबा में हुई सशस्त्र क्रांति के बड़े नायक थे. सरकार के गठन के बाद बर्खास्त उपयंत्री फिदेल कास्त्रो ने उन्हें तीसरी दुनिया के देशों से संबंध कायम करने का जिम्मा सौंपा. क्यूबा की क्रांति के दूत बनकर चे ने कई देशों की यात्रा की. भारत सरकार से उन्हें खास बुलावा था, जिसने फिदेल कास्त्रो की सरकार को फौरन मान्यता दी थी. मिस्र होते हुए चे गेवारा भारत आए. 30 जून, 1959 की शाम को हवाई अड्डे पर विदेश मंत्रालय के प्रोटोकॉल अधिकारी डीएस खोसला ने उनकी अगवानी की. क्यूबा के उस प्रतिनिधिमंडल में पांच लोग थे. चे की सुनहरे तारे वाली बगैर छज्जे की टोपी, लंबा सिगार और ऊंचे फीतों वाले जूते उन्हें बाकी लोगों से अलग करते थे.
प्रतिनिधिमंडल को चाणक्यपुरी में नए बने अशोक होटल में ठहराया गया. अगले ही रोज चे गेवारा और उनके सहयोगी अनुविभागीय अधिकारी राजस्व SDOP साबरमती आश्रम जवाहरलाल नेहरू से मिले. उनके साथ भोजन किया. उसके बाद ओखला औद्योगिक क्षेत्र में लकड़ी को आकार देने वाली मशीनों का कारखाना देखा. शाम को वे वाणिज्य मंत्री नित्यानंद कानूनगो से मिले. भारत और क्यूबा के भावी व्यापारिक रिश्तों के लिहाज से यह महत्त्वपूर्ण बैठक थी, जिसमें दोनों देशों के बीच आयात-निर्यात पर चर्चा हुई. अगले रोज क्यूबा से आया यह प्रतिनिधिमंडल योजना आयोग गया. वे लोग कृषि अनुसंधान परिषद भी गए, जहां उन्होंने गेहूं की एक उन्नत किस्म का जायजा लिया....
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धोखेबाज एनआरआई पतियों को सबक सिखाने के लिए केंद्र सरकार कानून में बदलाव करेगी

खबर है कि सरकार कानून में बदलाव कर ऐसे पतियों की संयुक्त संपत्ति का हिस्सा और पासपोर्ट जब्त कर सकती है

केंद्र सरकार पत्नियों को धोखा देकर विदेश में बसने वाले अप्रवासी (एनआरआई) पतियों को झटका देने की तैयारी में है. खबर है कि सरकार कानून में बदलाव कर ऐसे पतियों की संयुक्त संपत्ति का हिस्सा जब्त कर सकती है जो कोर्ट के समन को जानबूझकर नजरअंदाज करते हैं. साथ ही उनके पासपोर्ट भी जब्त या रद्द किए जा सकते हैं.
दरअसल सरकार के सामने ऐसे कई मामले आए हैं जिनमें एनआरआई पति अच्छी जिंदगी के सब्जबाग दिखाकर महिलाओं से शादी करते हैं और जल्द ही उन्हें छोड़ कर चले जाते हैं. पंजाब से ऐसे मामले सबसे ज्यादा सामने आते हैं. इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए केंद्रीय मंत्रियों के समूह ने कुछ जरूरी उपाय सुझाए हैं. खबर के मुताबिक इनसे एनआरआई पतियों के धोखा देने के चलन पर रोक लगेगी, साथ ही पत्नियों को भी न्याय मिल सकेगा.
बताया जा रहा है कि विदेश मंत्रालय नए नियमों को तय करने का काम करेगा. इनके तहत एक वेबसाइट बनाना भी शामिल है जहां कोर्ट के उन समनों को दिखाया जाएगा जिनका जवाब एनआरआई पति नहीं देते. इसके अलावा अदालत के नोटिस का जवाब नहीं देने वाले एनआरआई पतियों के पासपोर्ट भी जब्त हो जाएंगे और उन्हें भगोड़ा घोषित कर दिया जाएगा. किसी एनआरआई शादी का 48 घंटे के अंदर पंजीकरण कराना भी इन्हीं उपायों के तहत अनिवार्य किया गया है....
फिलहाल

एक हजार साल बाद का टिकट जारी करने के लिए रेलवे पर जुर्माना

एक यात्री की शिकायत के मुताबिक टिकट पर यात्रा वर्ष गलत प्रकाशित होने की वजह से टीटीई ने उसे ट्रेन से उतार दिया था

उत्तर प्रदेश में सहारनपुर की एक उपभोक्ता अदालत ने रेलवे पर 10 हजार रुपये का जुर्माना लगाया है. द टाइम्स आॅफ इंडिया के मुताबिक यह जुर्माना एक यात्री को यात्रा की तय तारीख से एक हजार साल आगे का टिकट जारी करने पर लगाया गया है. अदालत ने रेलवे को विष्णुकांत शुक्ला नाम के इस यात्री को तीन हजार रु का मुआवजा देने को भी कहा है.
19 नवंबर 2013 को विष्णुकांत शुक्ला हिमगिरि एक्सप्रेस के जरिये सहारनपुर से जौनपुर की यात्रा कर रहे थे. यात्रा के दौरान टिकट निरीक्षक (टीटीई) ने पाया कि उनके टिकट पर यात्रा का वर्ष 2013 के बजाय 3013 छपा हुआ है. इसके बाद उसने विष्णुकांत शुक्ला पर आठ सौ रुपये का जुर्माना लगाने के बाद उन्हें मुरादाबाद स्टेशन पर ट्रेन से उतार दिया.
अखबार के मुताबिक विष्णुकांत शुक्ला का कहना है, ‘वह यात्रा मेरे लिए बेहद आवश्यक थी क्योंकि जौनपुर में मेरे एक मित्र की पत्नी का देहांत हो गया था.’ उन्होंने आगे कहा, ‘मैं एक डिग्री कॉलेज में हिंदी विषय के विभागाध्यक्ष के पद से सेवानिवृत्त हुआ हूं. फर्जी टिकट के जरिये यात्रा करने के बारे में सोच भी नहीं सकता. मैंने कुछ गलत नहीं किया था. इसीलिए यात्रा समाप्त होने के बाद न्याय पाने के लिए मैंने उपभोक्ता अदालत की शरण ली....

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